He, who died..

He, who died..

Its just, he was alone
for all those nights..
a hate.. for lives,
that he has, lived..
howling for his dreams
confined to his fears,
suppressing his tears..
he used to choke,
while trying to speak..
as if its ripping his throat,
but still he carved..
for another reason,
to cut it apart..
don’t know why,
he didn’t want to die..
from dusk till dawn,
heard him pray..
just for another day..
and on the day,
when he woke up..
and found the haze
‘n the fog inside,
The curtains wet..
windows open..
doors ajar..
has it rained.. ?
perhaps he cried..
last night… he, who died..!


Shrek – hallelujah by sachin verma

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Tum Pukar lo.. Tumahara Intezaar hai !

एक इंतज़ार है,
इन आँखों को, जो जानेकहाँ तक..
उन अंधेरी वीरान हो चुकी गलियो मे,
तुम्हे खोजती हैं,
जिनसे कभी हम गुज़रे थे !

एक इंतज़ार है,
मेरे एहसासों को, जो जाने कब से..
दिल के अंधेरो मे,
तन्हा, गुमसुम है !

एक इंतजार है,
मेरे दिल को, जो कब से..
तुमसे कुछ लफ़्ज़ों, को तरसता है !

एक इंतज़ार है,
और भी कितने इंतज़ारों की तरह..
कि तुम पुकारोगे..
मेरे इंतेज़ारों कि मिश्री मुझे दोगे,
और तब, उन अंधेरी वीरान गलियों मे..
वो लफ्ज़, मेरे एहसासो को पाकर..
एक नये संगीत को गुनगुनायेंगे !!

एक इंतज़ार है,
कि कभी तो मेरे इंतजारो की सीमाए..
बढ़कर तुम्हे मेरे छू लेंगी,
और तुम्हे मेरे इंतेज़ारों का एहसास होगा,
तब तुम चुपके से बढ़कर..
मेरा हाथ थाम लोगी,
मेरे बिखरे सपनो को समेट कर,
उनमे रंग भर दोगी !!

एक इंतज़ार है,
की जब तेरे दिल की धड़कन,
मेरे दिल की तरह ही धड़केंगी..

एक इंतज़ार है,
उस खामोशी का,
जिसके बाद कोई भी तुंफान,
तुम्हे मुझसे जुदा न कर पाएगा,

एक इंतज़ार है,
की तुम पुकरोगी,
“तुम पुकार लो..
तुम्हारा इंतज़ार है !!”

Hemant from Khamoshi – “तुम पुकार लो.. तुम्हारा इंतज़ार है !!” by sachin verma

I DREAMT, THE BOOK..

I dreamt, the book..

I dreamt, a book..
torn and dusty..
a way written,
a way empty..
perhaps, was alive..
‘Words’ in it,  screams
but not as it seems..
they ask, they bleed..
they hurt, they cry..
but never they lie,
they are not just the words,
trapped in the wood..
not ’bout the crowd
or ’bout the lonelihood..
words from you,
and then ’bout..
those thirsty swollen eyes..
things were written,
imbrued with sobs,
scared, tired and bitten..
by each discrete names,
were carved faces..
embossed to their frames
tattered on other pages..
solemnly.. folded were,
few edges..
I’ve tried to unfold..
wondering who read it, before ?
but then no longer
could hold..
was awaken.. by the pair of
bleeding eyes..

GOD ! was that a dream,
why could I still hear the scream ?
who were those eyes ?
who has folded, those pages ?
why were, familiar..
those faces ?

 

perhaps..
I dreamt, the book !!!

A Walk by the Stranger

A Walk by The Stranger

One fine winter night..
looking for nothing..
walking down the road,
all alone, on my own..
I thought, I knew..
The skies, stars ‘n the moon..
‘n every things around,
suddenly I realized..
how dead they felt to me now..
there was time,
they use to talk to me..
now all i hear is..
their frozen silence,
dispersed and diffused in me..
frigid to my steps..
I wonder if it’s the temperature
or it’s their queering eyes..
that infusing,
this chill to my very soul
rigid as never before,
I turned my back to them..
hoping they won’t see
the numb ‘n the stranger in me ..
no matter what I’ve tried..
they already knew..
what I’ve lived,
and where I could hide..
silent as the grave,
a minute before..
the night
now yelling,
in its freezing tone..

“ you’re the stranger, you’re alone..”

मेरा पागल मन !

एक उजली सुबह,
ख्यालों के बादल..
मेरे दिल के आँगन में,
कुछ ओर नमी लेकर उतर आये..!
मेरे तन्हा घर मे दस्तक दी
कौन है ! कौन आया होगा ? ”
किसी ने भूलकर दरवाज़ा खटखटाया होगा !”

एक भीनी सी खुश्बू,
एक शीतल सा एहसास,
और धुँधलाधुँधला सा सबकुछ..

अचानक हीबसंतमेरे घर गाया,
क्यारी केफूल‘,
जो जाने कब से खिलाना भूल सा गये थे,
फिर अंगड़ाई सी ले रहे हैं !
उनके पत्तों पर उतार आई नमी….
बूँद बनकर, नए एहससों की रोशनी, बिखेरने
लगती है !

साँसों मे घुली मिठास
ओर नया नया सा सबकुछ
इतने
प्यारे फूल, “ये मैने कब बोए थे !”
ये दीवारें, ” इन पर ये रंग तो ना था
ये आईना, ” ये तो झूठ नहीं बोलता, पर ये मैं तो नहीं हूँ!”
और मेरी तन्हाई
वो कहाँ है
ये क्या हो रहा है, मैं हूँ पर.. मैं,
दिल तो कुछ ओर कह रहा है ?”

ख़यालो..
ये किसकासाथहै तेरे साथ !
जिसने मेरे ही मन को मुझसे ही..
अजनबी कर दिया है !!”
और ये रोशनी कैसी,
मेरे मन मे तो कोई सूरज नहीं है
ये आईना इसपर किसने जादू किया है
इन फूलों को तो देखो,
जैसे सारा गुलशन ही समेट लिया है !
बोलो ना, किसकासाथहै, तेरे साथ

कोई आने वाला है..
रेहने को तेरे दिल में,
उसका ही जादू है तेरे मन में,
ये आईना झूठ नहीं हक़ीकत है,
तुझे भी तो उसी की हसरत है !
वो ही तो है , तेरी रोशनी
और वोही तो तेरा सूरज है,

अब वो रही है, तो..
उसपरीको आपने मन के,
मुरझाए फूल दिखाएगा,
चलमनतू अब,
हर पल एक नया फूल
खिलाएगा…!

“‘परी“,  परी है‘ !! तो मेरे पास क्यों आएगी,
हाँ चलो हसरत है, तो क्यापरीमिल जाइएगी..
औरमन‘, तू तो पागल है,
इन ख़यालों की बातों मे गया
आरे पागल चाँद क्या हथेली मे समाएगा..
और इतना बड़ा सूरज,
क्या तुम्हे मिल जाएगा.. !
पागल!”  चल फिर तन्हाई ढूंढते हैं,
और इन फूलों को उखाड़ फेकते हैं !

केह दो इन ख़यालों से,
बसंतले कर बाहर जाये..
और केह दो हमे इस तरह तो ना सताये,
हाँ प्यारे हैं तो क्या..
झूठे ख्वाब तो ना दिखाए !
क्योंकि सपनो के टूटने पर,
ये सारे आईने टूट जायेंगे..
टूट कर चुभेंगे, तुझे और मुझे..
और ये ख़याल दूर खड़े मुस्कुराएगे !
फिर किसी का तो क्या
खुद का चेहरा नहीं देख पाएगा,
फिर जाने तू, कब संम्भल पाएगा

मनबोझिल कदमो से चलता..
आपने फूलों.. “

दरवाजे पर फिर से दस्तक,
एक मीठा सा तेज़ उजाला..
एक प्यारा सा संगीत, हँसता
बादल,
जाना पहचाना सा सूरज..
और पूरा गुलशन..

मेरा पागल मन !

परी गयी ! परी गयी !”
सचमेरीपरी गयी….

Stigmata of rapture soul

Stigmata of rapture soul

My tears grew for more shine,
i celebrated it,
bleeding red wine..
something was burning inside..
ripping with all ease,
it has it’s deepest sharp..
rending, scorching my heart,
what has died inside..?

“no more running..
no where to go,
‘n no more hide..”

doom ? or should call it destination..
no more pretending…
yeah ! can see no one standing
it’s just me, gazing in the dark..
waiting to go numb,
what’s left behind..
a soul that lingers,
that dwell across heart..
I’ve made it glow,
‘n now its dripping out of  my veins..
to make the flow,
then no more hurting,
no burning.. no scorching..

you may call.. it insane,
i say it “the stigmata”
of a ruptured soul..
away from the pain..!!!

Baby when you’re gone.

Baby.. when you’re gone !

I tried to play the song..
“Baby when you’re gone..”
Cleared the dust..
tuned.. my guitar,
tied the chords..
hit the strings..
hell.. that too sounds like
the broken thing..
like a ruptured soul,
with broken wings…
then I sung the next line

“days go on ‘n on
and night seems so long”

Picked up the pencil..
and the kit, tried to sketch
the beauties around..
my barren harvest..
the torment dusk
but no dawn..
hell.. that’s all, I could find..

“oh, this is torture, this is pain,
it feels like I’m gonna go insane”

my broken woes..
torn, horrid sketches..
the broken string..
and that song,
like the husky..
whisper in the distance..

“things just feel so wrong,
baby when you’re gone”