डर

कल ही तो तुम,
फिर मेरे सपने मे आई थी
कुछ वादे, कुछ वफ़ा..
और ढेर सारे सपने लाई थी,
उन सपनो को आसमा पर बिछा कर हमने
उन्हे तारों से सजाया था..!
उन ‘वादों’ को, उस पुरानी इमारत मे..
कितनी बार दोहराया था !

एक घर बनाया था..
“सिर्फ एक रेत का घर नही है”
जाने कब तक दुहराया था !
पर रेत का ही घर था.. शायद,
छूते ही टूट गया..
टूट कर एक एक टीला हो गया !

और भी कितने टीलों की तरह,
जो वहीं हुमारे टीले के पास थे !
हमारे ही एहससों की तरह..
दफ़्न उनमे भी,
न जाने कितने एहसास थे !

क्यों कर ऐसा होता है,
क्यों दिलों मे, एक रेत का टीला होता है,
क्यों टूटते हैं सपने अक्सर..
और क्यों एक डर हर सपने के साथ होता है !!